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अमरीका आर्थिक के अलावा सामाजिक

अमरीका आर्थिक के अलावा सामाजिक तौर पर भी महान देश क्यों है,

उसे जानने के लिए वर्तमान के "जॉर्ज फलोयड" आन्दोलन पर हमे नजर डालनी चाहिए, जिसमे "अश्वेत व्यक्ति" की श्वेत पुलिस अधिकारी द्वारा हत्या करने पर वंहा के "श्वेत लोग" पुलिस अधिकारी को बचाने की जगह उसे "कड़ी सजा" देने के लिए प्रदर्शन कर रहे है. 

लॉकडाउन के बीच अमरीका में एक आन्दोलन ने कई शहरो को जद में ले लिया है, यह आन्दोलन इस कद्र तक बढ़ गया है की डोनाल्ड ट्रम्प की अपील पर पेंटागन ने सेना को हिदायत दी है की वो चार घंटे के शोर्ट नोटिस पर स्तिथि पर काबू करने के लिए पोजीशन लेने के लिए तैयार रहे। 

1.आंदोलन का विषय
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इस आन्दोलन का विषय एक अश्वेत अथार्त काले व्यक्ति "जोर्ज लोयड" की हत्या से शुरू हुआ. जिसमे अम्रीका के मिनेपौलिस शहर में फर्जी बिल के मामले में एक अश्वेत व्यक्ति को पुलिस अधिकारी डेरेक शाविन जो की श्वेत था, ने पकड़ा और सडक पर ही उसकी गर्दन पर अपने पैर को रख दिया जिससे उस अश्वेत व्यक्ति की सांसे उखड़ने लगी, इस पुलिस अधिकारी ने पुरे 9 मिनट तक अपने पैर को उसकी गर्दन पर रखा. इसके बाद आसपास खड़े लोगो ने पुलिस अधिकारी से छोड़ने की गुहार लगाई, इसके अलावा पीड़ित अश्वेत जॉर्ज फ्लॉयड ने भी बार कहा की में मुझे छोड़ दीजिये, "में सांस नही ले पा रहा हूँ". 

उसके बाद भी पुलिस अधिकारी डेरेक साविन ने उसे नही छोड़ा. जिसके बाद "में सांस नही ले पा रहा हूँ" जोर्ज के आखरी शब्द बन गये और वर्तमान के प्रदर्शन का भी यह मुख्य स्लोगन बन गया है. 

2. इस दौरान राह चलते हुए किसी राहगीर ने इसकी विडिओ बना ली और अपलोड कर दी, जिसके बाद पुरे आमरीका में उबाल आ गया है. प्रदर्शन हिंसक हो चुके है. कई दुकाने लुट ली गयी है. हिंसा में एक युवक की गोली लगने से मौत हो गयी है. 

3.विशेष बात
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इस आन्दोलन की विशेष बात यह है की इस आन्दोलन में बढ़ चढकर "श्वेत लोग " हिस्सा ले रहे है. वो जॉर्ज फ्लॉयड को न्याय दिलवाने के लिए सडको पर है. आन्दोलन कर रहे है. "अश्वेत लोगो" के साथ कंधे से कंधा मिलाकर आन्दोलन का हिस्सा बन रहे है. बल्कि स्वय आन्दोलन की अगुआई तक कर रहे है. 

4.प्रश्न :क्या ऐसा भारत मे होता है?.
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अब प्रश्न यह है की क्या यह भारत में हो सकता है?. क्या भारत में एससी/एसटी के साथ जो रोजाना "जॉर्ज फ्लॉयड" जैसी घटनाये होती है, उसमे गैर एससी/एसटी इस प्रकार के आन्दोलन का हिस्सा बन सकते है. 

उत्तर:
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इस बारे में सोचना भी गलत है. क्युकी वो आन्दोलन का हिस्सा बनने की जगह आरोपी को बचाने के लिए हर तरह की कोशिस करेंगे, सरकार से लेकर प्रशासन तक पर दवाब डालेंगे. आन्दोलन खत्म करने के लिए अपने बंदे भेजकर हिंसक आन्दोलन में तब्दील करवा देंगे. मुख्य मुद्दा ही खत्म हो जाएगा। और जो एक दो ब्राह्मण, छत्रिय, वैश्य में समानता के लक्षण होने के कारण आंदोलन का हिस्सा बनेंगे, उन्हें भी टारगेट कर दिया जाएगा.

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