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बौद्धों को मध्ययुगीन भारत में "बुद्धिस्ट-वैष्णव" (Buddho-Vaishnavas) क्यों बनना पडा था|

 बौद्धों को मध्ययुगीन भारत में "बुद्धिस्ट-वैष्णव" (Buddho-Vaishnavas) 

क्यों बनना पडा था|


अनेक लोग यह मानते हैं कि, सम्राट हर्षवर्धन और बंगाल के पाल सम्राटों के बाद भारत से बौद्ध धर्म खत्म हुआ था, लेकिन यह गलत है| मध्ययुगीन काल में भारत से बौद्ध धर्म खत्म नहीं हुआ था, बल्कि वह प्रछन्न वैष्णव धर्म के रूप में जीवित था| 


ब्राम्हणों ने बौद्ध धर्म के खिलाफ भयंकर हिंसक अभियान सम्राट हर्षवर्धन की मृत्यु (सन 647) के बाद चलाया था| बौद्धों का खात्मा करने के लिए पाशुपत और कापालिक जैसे हिंसक शैव पंथ बनाए गए थे| आदि शंकराचार्य खुद शैव पंथी था और उसने बौद्ध विहारों पर कब्जा करने के लिए ब्राम्हणवादी साधुओं की खास सेना बनवाई थी, ऐसा प्रसिद्ध इतिहासकार तथा संशोधक जियोवान्नी वेरार्डी ने बताया है| 


हिंसक शैवों ने बुद्ध के स्तुपों को और सम्राट अशोक के शिलास्तंभों को हिंसक युपों में तब्दील कर दिया था, जहाँ पर शेकडो प्राणियों की बलि दी जाती थी और बुद्ध के अहिंसा तत्व का खुलेआम विरोध किया जाता था| कुछ यज्ञों के युपों पर आज भी नीचे बुद्ध की मुर्ति दिखाई देती है| शैवों और बौद्धों के बीच चले इस भयंकर हिंसक युद्ध को पुराणों में "देवासुर संग्राम" कहा गया है, जिसमें शैवों को देव और बौद्धों को असुर कहा गया है ऐसा संशोधक के. सी. पानिग्रही ने कहा है| (K. C. Panigrahi, 1986, p. 310) 


शैवों ने ही बौद्ध स्तुपों को और सम्राट अशोक के पिलर्स को शिवलिंग में परिवर्तित कर दिया था| भुवनेश्वर का भास्करेश्वर लिंगम वास्तव में सम्राट अशोक का शिलास्तंभ था, जिसको बंगाल के शैववादी ब्राम्हण राजा शशांक ने शिवलिंग में तब्दील कर दिया था| सम्राट हर्षवर्धन ने शशांक पर इतना भयंकर हमला कर दिया था की उसके सदमे से वह बाद में मर गया था|


शैवों के इस भयंकर हिंसा से बचने के लिए बौद्धों को वैष्णव पंथ का सहारा लेना पडा़ और वे "बौद्ध-वैष्णव" बने| ओरिसा के बौद्ध वैष्णव अच्युतानंदन बताते हैं कि, बौद्धों पर भयंकर अत्याचार हो रहें हैं और हम कहाँ जाएं कुछ समझ नहीं आ रहा है| तब जगन्नाथ बुद्ध ने मुझे सपने में आकर बताया कि, इस कलियुग में खुद को बचाने के लिए तुम वैष्णव रुप धारण करो और मेरी विष्णु के रूप में पुजा करो| 


"जाऊ अच्युत अनंता यशोवंत दास, 

बलराम जगन्नाथ कर जा प्रकोस||"


जाओ अच्युतानंदन, अभी कलियुग से बचने के लिए मेरी जगन्नाथ, बलराम के रूप में पुजा करो और फिर यह कलियुग खत्म हो जाने पर अपना वास्तव बौद्ध रुप धारण कर मेरी बुद्ध रुप में पुजा करो|


पंढरपुर में वारकरी संतों ने भी "प्रछन्न वैष्णव अर्थात बौद्ध वैष्णव" बनकर बुद्ध की विठ्ठल के रूप में पुजा शुरू कर दी थी| तमिल भाषा में "विठाई (Vitthai)" मतलब "प्रज्ञा (Wisdom)" होता है और विठ्ठल मतलब प्रज्ञावान अर्थात बुद्ध यह अर्थ होता है| ( Tamil Buddhism, Gajendran Ayyathurai, 2011, p. 28) 


विठ्ठल दक्षिण भारत का तमिल शब्द है, जिसका अर्थ बुद्ध होता है, तो रुक्मिणी यह रुक्खमणि नामक पाली शब्द है जिसका महासुखावती व्युह सुत्र में अर्थ बोधिवृक्ष बताया गया है| इस तरह, विठ्ठल और रुक्मिणी वास्तव में बुद्ध और बोधिवृक्ष है, जिनकी पुजा वैष्णव रुप में बौद्ध वैष्णव संत करते थे| इसलिए, महाराष्ट्र के संतों ने खुलकर बताया है कि, हमारा विठ्ठल वास्तव में बुद्ध ही है| 


ओरिसा के बौद्ध वैष्णवों की तरह महाराष्ट्र के बौद्ध वैष्णव संत बताते हैं कि, मध्ययुगीन काल में सभी तरफ अन्याय, अत्याचार का अधर्म बढ चुका था (न देखवे डोला ऐसा आतंक- मतलब आखों से देखा नहीं जाता इतना अत्याचार बढेला चुका है, ऐसा संत तुकाराम महाराज कहते हैं), जिससे तंग आकर बौद्धों ने अपना मूल बौद्ध स्वरूप छुपाकर वैष्णव रुप अपनाया था| जगन्नाथ अच्युतानंद को बताते हैं, "कलियुगे बुद्धरुपे निज गोप्ये" मतलब कलियुग में तुम अपना बौद्ध रुप गुप्त रखो| इसलिए, संत नामदेव बताते हैं, 


"धर्म लोपला अधर्म जाहला हे तू न पाहसि,

या लागी बौद्ध रुपे पंढरी नांदसी||"


मतलब, धम्म का पतन हो चुका है और अधम्म (विषमतावादी ब्राम्हणधर्म) का सभी तरफ फैलाव हो चुका है, इसलिए तथागत बुद्ध विठ्ठल या विठोबा के छद्दम बौद्ध रुप में पंढरपुर में स्थापित हुए है, ऐसा संत नामदेव महाराज कहते हैं|

इसी तरह संत जनाबाई कहती है, 


"कलियुगी हरि बुद्ध रुप धरी, 

तुकोबा शरिरी प्रवेशिला|"


मतलब, कलियुग में हरि अर्थात अरहर बुद्ध विठ्ठल का रुप धारण कर संत तुकाराम महाराज के रूप में अधर्मी ब्राम्हणवाद का सामना कर रहे हैं|


इस तरह, प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण मध्ययुगीन भारत में बौद्धों को छदम वैष्णव रुप लेकर खुद का बचाव करना पड़ा था| इसलिए उन्होंने बुद्ध को जगन्नाथ, विठ्ठल, तिरुपति बालाजी, केदारनाथ, बदरीनाथ, भैरवनाथ, आदिनाथ, अयप्पन जैसे अलग अलग नाम देकर बुद्ध की परंपरा को जीवित रखा था| अनुकूल समय आने पर बौद्ध वैष्णव फिर से अपना बौद्ध स्वरूप दुनिया के सामने रखेंगे और भारत को फिर से बुद्ध का भारत बना देंगे ऐसा उन्हें विश्वास था| 


और संतों की अपेक्षा अनुसार ऐसा ही हुआ| ओरिसा के राजा प्रतापरुद्र (1497-1540) ने बौद्धों को ढूंढ ढुँढ कर मारने का अभियान शुरू कर दिया था, लेकिन उसके पुत्र मुकुंददेव ने बौद्ध धर्म को अपनाकर फिर से बौद्ध धर्म का अभियान पुनर्जीवित कर दिया था|


इससे पता चलता है कि, मध्ययुगीन भारत में बौद्ध धर्म को बचाने के लिए तथा खुद का बचाव करने के लिए बौद्धों ने वैष्णव रुप अपनाया था और अनुकूल माहौल में वास्तविक बौद्ध स्वरूप उजागर करने का भरोसा दिलाया था| अब संविधान के कारण भारत में अनुकूल माहौल है| इसलिए, बौद्ध वैष्णव संतों का तथा उनके आराध्य दैवत विठ्ठल का बौद्ध स्वरूप उजागर करना जरूरी है|


-  डॉ. प्रताप चाटसे, बुद्धिस्ट इंटरनेशनल नेटवर्क

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