लॉकडाउन व इस तरबूज में क्या समानता हो सकती है?..
समानता यह है कि;
"जिस प्रकार एकाएक प्रकट होकर लॉकडाउन कह दिया गया उसी प्रकार स्टेशन से ट्रेन चलते ही खिड़की पर बैठे युवक ने बिना सोचे समझे तरबूज खरीद लिया"
अब समस्या यह है कि;
"लॉकडाउन वो गले की हड्डी बन गया जो न तो अगली जा रही और न ही निकल आप रही है, इसी प्रकार यह तरबूज खिड़की से अंदर आ नही पा रहा और न ही छोड़ा जा सकता है"
अब;
"लॉकडाउन ने आर्थिक स्तिथि की कमर तोड़ दी है उसी प्रकार यह तरबूज इस व्यक्ति का हाथ जरूर दुखा देगा जब तक कि अगला स्टेशन न आ जाये"
इसके अलावा;
1.महाभक्तिकाल के भक्त यह नही समझा पा रहे है कि जिस समय 8 हजार रोजाना केस आ रहे है उस समय खोल दिया गया तो फिर लगाया ही क्यो था?. इसका क्या फायदा हुआ?.
2.उसी प्रकार तरबूज का मालिक भी समझा नही पा रहा कि चलती ट्रेन की खिड़की से तरबूज लिया ही क्यों था?.
वैसे मेरी सलाह यह है कि;
"महाभक्तिकाल के भक्तों से लॉकडाउन पर बहस न करे, क्योंकि "सर सलामत" रहना बहुत जरूरी है, क्योंकि भक्तों की खुद समझ मे नही आ रहा कि "वाह-वाह" करेंगे तो बदनामी होंगी और साहब की निंदा कर नही सकते। इसी उधेड़बुन में कोई महाभक्तिकाल का भक्त आपका सर तरबूज समझकर न फोड़ दे"
By Babu Gautam

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