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संस्कृत बहुत पुरानी भाषा है या मोर्य वंश

 तर्कशील लोगों को छोड़कर अधिकांश डिग्रीधारी की मान्यता :- #संस्कृत बहुत पुरानी भाषा है या मोर्य वंश के बाद यूनानी शासक और गुप्त शासक द्वारा संस्कृत भाषा का उपयोग किया जाने लगा था। क्या यह प्रामाणिक है? इसको समझने के लिए एक शब्द धम्म को लीजिये।  सम्यक संस्कृति में धम्म का अर्थ प्रकृति, मनुष्य और सभी चेतनशील प्राणी के गुण स्वभाव को #धम्म कहा जाता था।  जिस धम्म को संस्कारित करने पर संस्कृत में धर्म लिखा जाता है और बोला जाता है।  परंतु सामन्ती संस्कृति में धर्म का अर्थ एक प्रकार का कर्मकांड और पूजा विधि की परंपरा को कहा जाता है। अब मुख्य बात पर आते हैं - धम्म को संस्कृत में धर्म जब लिखा जाता है तो मोर्य काल के बाद यवन, कुषाण, गुप्त जैसे आरोपित सम्राट द्वारा भी इस धम्म का लेखन संस्कृत शब्दावली अनुसार धर्म लिखना चाहिए था लेकिन ऐसा नही है। नीचे मौर्यकाल का अभिलेख सहित यवन काल, कुषाण काल और गुप्त काल का अभिलेख लगा है , जिस अभिलेख में सबों ने धम्म को धम्म ही लिखा है। किसी ने भी उस धम्म को संस्कारित भाषा मे धर्म नही लिखा है। इससे साफ जाहिर होता है कि यह सारा आरोप धूर्तों द्वारा...

अशोक चक्र " का जब issue उठा तब।

 🇮🇳"अशोक चक्र " के लिए बाबासाहब ने बहुत Struggle किया है। .. " अशोक चक्र " का जब issue उठा तब। पूरी Parliament में हंगामा शुरू था। .. पूरी Parliament दनदना गयी थी।..   पहले राष्ट्रध्वज का कलर बनाने के लिए बाबासाहब ने " पेंगाली वेंकैय्या " को चुना था। ...पेंगाली वेंकैय्या को कलर के बारे में जनाकारी थी। ... उनका संवैधानिक चयन बाबासाहब ने किया था। ,.. पेंगाली वेंकैय्या ने ध्वज का कलर तो बनाया लेकिन वो कलर ऊपर निचे थे ... मतलब सफ़ेद रंग सबके ऊपर , फिर ऑरेंज और फिर हरा। ...  बाबासाहब ने सोचा , अगर अशोक चक्र हम रखे तो वो नीले रंग में होना चाहिए , और झंडे के बिच में होना चाहिए  ... ऑरेंज रंग पे " अशोक चक्र " इतना खुल के नहीं दिखेगा। ... बाबासाहब ने सोचा , अगर सफ़ेद रंग को बिच में रखा जाए जो की शांति का प्रतिक है , उसपर अशोक चक्र खुल के भी दिखेगा। .. और शांति के प्रतिक सफ़ेद रंग पे बुद्ध के शांति सन्देश का अशोक चक्र उसका मतलब बहुत गहरा होगा। ...  इसलिए बाबासाहब ने वो कलर ठीक से सेट किये। .. और सफ़ेद रंग बिच में रखा ताकि उसके ऊपर " अशोक चक्र  रखा जाए। ...

इन्सान ने ही भगवान का निर्माण किया है इसके तार्किक सबूत निम्नलिखित है

इंसान/भगवान इन्सान ने ही भगवान का निर्माण किया है इसके तार्किक सबूत निम्नलिखित है 1.मनुष्य के अलावा दुनिया का एक भी प्राणी भगवान को नही मानता। 2.जहाँ इन्सान नही पहुँचा वहाँ एक भी मंदिर मस्जिद या चर्च नही मिला। 3.अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग देवता है।इसका मतलब इन्सान को जैसी कल्पना सुझी वैसा भगवान बनाया गया। 4.दुनिया मे अनेक धर्म पंथ और उनके अपने-अपने देवता है। इसका अर्थ भगवान भी एक नही। 5.दिन प्रतिदिन नये नये भगवान तैयार हो रहे है। 6.अलग-अलग प्रार्थनायें है। 7. माना तो भगवान नही तो पत्थर यह कहावत ऐसे ही नही बनी। 8.दुनिया मे देवताओं के अलग-अलग आकार और उनको प्रसन्न करने के लिए अलग-अलग पुजा। 9.अभी तक किसी इन्सान को भगवान मिलने के कोई प्रमाण नही है। 10.भगवान को मानने वाला और नही मानने वाला भी समान जिंदगी जीता है। 11भगवान किसी का भी भला या बुरा नही कर सकता। 12.भगवान भ्रष्टाचार अन्याय चोरी बलात्कार आतंकवाद अराजकता रोक नही सकता। 13.छोटे मासुम बच्चों पर बंदुक से गोलियाॅ दागने वालों के हाथ भगवान नही पकड सकता। 14.मंदिर मठ आश्रम प्रार्थना स्थल जहाॅ माना जाता है कि भगवान का वास होता है वहाॅ भी बच्चे म...

मुंबई. बॉम्बे हाईकोर्ट की औरंगाबाद बेंच ने मंगलवार को अंधविश्वास को बढ़ावा देने से रोकने के लिए अहम फैसला सुनाया

मुंबई. बॉम्बे हाईकोर्ट की औरंगाबाद बेंच ने मंगलवार को अंधविश्वास को बढ़ावा देने से रोकने के लिए अहम फैसला सुनाया Andhvishwas । बॉम्बे हाईकोर्ट ने अंधविश्वास और उससे जुड़े सामाग्री को बढ़ावा देने वाले विज्ञापनों के प्रसारण पर रोक लगाते हुए कहा कि ऐसे विज्ञापन प्रसारित करना जुर्म है। इसे लेकर चैनल और विज्ञापन देने वाली कंपनियों को कानूनी कार्रवाई का भी सामना करना पड़ेगा। बेंच ने मंगलवार को हनुमान चालीसा यंत्र के विज्ञापन के प्रसारण के मामले में सुनवाई करते हुए चार टीवी चैनलों के खिलाफ आपराधिक केस दर्ज करने का भी आदेश दिया। कोर्ट ने कहा, इससे जनता के बीच अंधविश्वास को बढ़ावा मिलता है। मामले की सुनवाई के दौरान बेंच ने कहा, काला जादू अधिनियम की धारा 3 ना सिर्फ जादू, बुरी प्रथाओं को प्रतिबंधित करती है, बल्कि उनके प्रचार प्रसार को रोकने का काम करती है। कोर्ट ने कहा, इस अधिनियम की धारा 3 (2) के तहत, इस तरह की गतिविधियों में शामिल होना भी अपराध की श्रेणी में है। इसलिए ऐसे विज्ञापन प्रसारित करने वाले भी इसके तहत कार्रवाई में आएंगे। क्या था याचिका में? दरअसल, हाईकोर्ट में शिक्षक राजेंद्र अंभोरे न...

मेरा विश्वास ‘धर्म’ में नहीं ‘तर्क’ में है, इसलिए मैं नास्तिक बना

 “मेरा विश्वास ‘धर्म’ में नहीं ‘तर्क’ में है, इसलिए मैं नास्तिक बना” आज से तीन साल पहले शायद ही मेरे गांव में मुझसे बड़ा कोई आस्तिक रहा होगा। उस समय मेरी नज़रों में वह हर व्यक्ति पाप का हकदार था जो भी ईश्वर के अस्तित्व को नकारता था। मेरी पारिवारिक पृष्ठभूमि ग्रामीण क्षेत्र से जुड़ी हुई है और मेरे परिजन अशिक्षित हैं, जो धर्म के प्रति उनके अंदर पैदा हुए आकर्षण को बढ़ाने के लिए एक ज़िम्मेदार कारक कहा जा सकता है। जिसका प्रभाव बाद में मुझपर भी पड़ा। पहले मेरे पिता भी एक नास्तिक ही थे, लेकिन धीरे-धीरे उनकी ज़िन्दगी में आयी समस्याओं ने उनको धर्म के प्रति इतना आकर्षित कर दिया कि आज वे भगवान कृष्ण के भक्त हैं और लोगों की समस्याओं को सुलझाने में व्यस्त रहते हैं। आज हमारे घर में ही एक बड़ा सा मंदिर है, जिसमें प्रतिदिन सुबह-शाम पूजा करने के लिए लगभग 1 घण्टा सुबह व 1 घण्टा शाम का समय लगता है। इसी मंदिर में, मैंने तीन साल पहले तक भगवान की आराधना की है। कहने का सार यह है कि अब भी मेरे घर में मुझे छोड़कर सब ईश्वर के प्रति गहन श्रद्धा रखते हैं। तीन साल पहले मैं आगे की पढ़ाई के लिए दिल्ली आया जोकि अभी तक ...

क्या बौद्ध धर्म हिन्दू धर्म के बाद जन्मा है?

संस्कृत व्याकरण के विद्वान् पतंजली 150 BCE में अपने ग्रन्थ महाभाष्य में लिखते हैं: “आर्यों की भूमि कौनसी है? यह सरस्वती नदी से पूर्व में है. कालक वन के पश्चिम हिमालय के दक्षिण और परियत्र पर्वत  के उत्तर में” इसका सीधा अर्थ है कि पतंजली के समय में आर्यावर्त (आर्यभूमि) की एक पूर्वी सीमा थी जिसके परे कोई अन्य सभ्यता या धर्म था. पतंजली के चार शताब्दी बाद मानव धर्म शास्त्र में मनु लिखते हैं  “हिमालय और विन्ध्य के बीच प्रयाग पूर्वी समुद्र से पश्चिमी समुद्र के बीच आर्यावर्त भूमि है”   इसका अर्थ हुआ कि चार शताब्दी बाद पतंजली के लिए जो प्रदेश पूर्व में था वह मनु के लिए मध्यदेश बन जाता है. अर्थात यह क्षेत्र आर्यों द्वारा जीत लिया जाता है. आर्यभूमि के प्रसार के लिए रास्ता अग्नि और यग्य द्वारा बनाया गया इसका अर्थ हुआ ये लोग जंगल जलाते हुए और युद्ध करते हुए आगे बढ़े. मतलब साफ़ है, मनु तक आते आते वह पूर्वी प्रदेश जो आर्यों का नहीं बल्कि असुरों का था वह आर्यों द्वारा जीत लिया जाता है. पतंजली वर्णित कालक वन मनु द्वारा वर्णित प्रयाग या वर्तमान इलाहाबाद के निकट है.पतंजली महाभाष्य के ही ...

एक तरफ तो फैक्ट्रियों में काम चल रहा था और कामगार काम से दुखी थे,

जो 70 साल से परेशान थे, “अच्छे दिनों वाली शासन के 6 साल, बेमिसाल-रिपोर्ट” जरूर पढ़ें। पढ़ते जाये, आँखें खुलती जाएँगी। सन 2014 से पहले तक इतिहास का वो दौर था जब हम भारत के  लोग "बहुत ही दुखी" थे। एक तरफ तो फैक्ट्रियों में काम चल रहा था और कामगार काम से दुखी थे, अपनी मिलने वाली पगार से दुखी थे। सरकारी बाबू की तन्ख्वाह समय समय पर आने वाले वेतन आयोगों से बढ रही थी। हर 6 महीने या साल भर में 10% तक के मंहगाई भत्ते मिल रहे थे, नौकरियां खुली हुईं थीं। अमीर, गरीब, सवर्ण, दलित, हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई सबके लिये यूपीएससी था, एसएससी था, रेलवे थी, बैंक की नौकरियां थीं। प्राईवेट सेक्टर उफान पर था।मल्टी नेशनल कम्पनियां आ रहीं थी, जाॅब दे रहीं थीं। हर छोटे बडे शहर में ऑडी और जगुआर जैसी कारों के शो रूम खुल रहे थे। हर घर मे एक से लेकर तीन चार अलग अलग माॅडलो की कारें हो रही थीं। प्रॉपर्टी मे बूम था। नोयडा से पुणे, बंगलौर तक, कलकत्ता से बम्बई तक फ्लैटों की मारा-मारी मची हुई थी। महंगे बिकते थे फ़िर भी बुकिंग कई सालों की थी। मतलब हर तरफ, हर जगह अथाह दुख ही दुख पसरा हुआ था। लोग नौकरी मिलने से, तन्...